नकद हस्तांतरण योजनाओं की राजनीतिक अर्थव्यवस्था : नागरिकों को लाभार्थियों में बदलने की कवायद

पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं और संसद के चुनावों में एक नया राजनीतिक चलन उभरकर सामने आया है, जो नागरिकों के अधिकारों की अवधारणा को बदल रहा है। चुनावों से ठीक पहले कई तरह की कैश ट्रांसफर योजनाएँ लागू कर दी जाती हैं या राजनीतिक पार्टियाँ चुनावों में ऐसी योजनाओं की घोषणा करतीं हैं। हालाँकि इन योजनाओं को अक्सर कमज़ोर वर्गों, ज्यादातर महिलाओं को सशक्त बनाने के मकसद से कल्याणकारी उपायों के तौर पर पेश किया जाता है, लेकिन इनके समय, डिज़ाइन और लागू करने के तरीके से पता चलता है कि इनका मक़सद जनता के हिस्सों की कल्याण कम, मतदाताओं को प्रभावित करना अधिक होता है।

चुनावी राजनीति में नकद हस्तांतरण का उभार

हाल के कई चुनावों में यह चलन साफ़ दिखता है। सबसे मुखर तौर पर यह उभर कर आया था बिहार विधानसभा चुनावों में जहां नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की ज़बरदस्त जीत के पीछे एक अहम वजह ‘मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना’ के तहत डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के ज़रिए महिला लाभार्थियों को 10,000 रुपये उनके बैंक खातों में जमा करना माना गया। खास बात यह है कि आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले यह पैसा लाभार्थियों के बैंक खातों में जमा किया गया था। 

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी ऐसा ही पैटर्न देखने को मिला। मध्य प्रदेश में, ‘लाड़ली बहना योजना’ के तहत महिलाओं को हर महीने मदद के नाम पर 1,500 रुपये दिए गए, जबकि महाराष्ट्र में ‘लाडकी बहिन योजना’ के तहत भी इसी तरह की मासिक रकम दी गई। दोनों ही मामलों में, इन योजनाओं ने बहुत ज़्यादा राजनीतिक महत्व हासिल किया और चुनावी प्रचार का मुख्य मुद्दा बन गईं। हाल ही में, कई दूसरे राज्यों में भी इसी तरह के कैश ट्रांसफर प्रोग्राम की घोषणाएं की गई हैं, जिससे पता चलता है कि सीधे नकद मदद देना तेज़ी से चुनावों में जीत का एक स्थापित ज़रिया बनता जा रहा है।

हालाँकि यह सच्चाई है कि एक स्तर पर, ये योजनाएँ निश्चित रूप से आर्थिक रूप से जूझ रहे परिवारों को तुरंत आर्थिक राहत देती हैं। बेरोजगारी के बढ़ते संकट, बढ़ती महंगाई, घटती वास्तविक मजदूरी और बढ़ती असुरक्षा (खासकर महिलाओं के बीच) को देखते हुए, कोई भी अतिरिक्त आय इन परिवारों का, अस्थायी ही सही महत्वपूर्ण सहारा बनती है। लेकिन इन योजनाओं का राजनीतिक प्रभाव अल्पकालिक आर्थिक सहायता से कहीं अधिक है और इसके पीछे शासक वर्ग की गहरी राजनीतिक साज़िश को समझना जरुरी है।  

भले ही सत्ताधारी पार्टियां इन्हें महिलाओं के सशक्तिकरण की पहल के तौर पर पेश करती हैं, लेकिन इनका असली मकसद अक्सर वोटरों को प्रभावित करना और तुरंत चुनावी फायदा हासिल करना होता है। यह सरकारी खर्च के ज़रिए चुनावी जीत हासिल करने का ज़रिया बन गया है। असल में, सरकारें सामाजिक सुरक्षा की व्यापक प्रणालियों को मज़बूत करने के बजाय राजनीतिक फायदा हासिल करने के लिए सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल कर रही हैं।

इसलिए, मुद्दा सिर्फ़ यह नहीं है कि नागरिकों को आर्थिक मदद मिल रही है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या कल्याणकारी योजनाओं को ही चुनावी फ़ायदे का ज़रिया बनाया जा रहा है। 

नागरिक से लाभार्थी: लेकिन बात सिर्फ इतनी सरल (चुनावी फ़ायदे के लिए सरकारी खजाने का अप्रत्यक्ष इस्तेमाल) नहीं है, बल्कि ज़्यादा गहरी और चिंताजनक बात इन कार्यक्रमों के आधार में छिपी एक ऐसी खतरनाक रणनीति है, जो नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को कमजोर करती है और उन्हें लोकतंत्र में सशक्त भागीदार बनाने के बजाय सिर्फ़ लाभार्थी बनाकर रख देती है।

इस पूरी राजनीतिक प्रक्रिया से धीरे-धीरे नागरिकों को लोकतांत्रिक गणराज्य के अधिकारों वाले सदस्यों के तौर पर नहीं, बल्कि मौजूदा सरकार की उदारता पर निर्भर लाभार्थियों में बदला जा रहा है। जाहिर है नागरिक अपने अधिकारों के लिए सजग नहीं होंगे बल्कि सीधा कहें तो वे मूलभूत सुविधाओं को अपना हक़ ही नहीं समझेंगे बल्कि योजनाओं को सरकार की मेहरबानी मानेंगे।  

नागरिकों के अधिकारों और सरकारी लाभों के बीच यह एक बुनियादी फ़र्क है। नागरिकों के अधिकार राज्य पर ऐसी ज़िम्मेदारियाँ डालते हैं जिन्हें लागू करवाना ज़रूरी होता है। नागरिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, रोज़गार, खाद्य सुरक्षा या सामाजिक सुरक्षा की माँग अपने हक़ के तौर पर कर सकते हैं, चाहे सत्ता में कोई भी राजनीतिक पार्टी हो।

दूसरी ओर, सरकारी योजनाओं के लाभों को अक्सर राजनीतिक नेताओं की तरफ़ से अपनी मर्ज़ी से दिए जाने वाले तोहफ़ों के तौर पर पेश किया जाता है। ये लोगों को सशक्त बनाने के बजाय उन पर निर्भरता बढ़ाते हैं और सार्वजनिक सेवाओं में ढाँचागत सुधारों के लिए नागरिकों की सामूहिक रूप से संगठित होने की क्षमता को कमज़ोर करते हैं। 

कल्याणकारी राज्य को कमजोर करता नवउदारवाद

इसके पीछे ठोस आर्थिक कारण है। नवउदारवादी आर्थिक नीतियाँ किसी भी तरह के सार्वभौमिक अधिकारों और कल्याणकारी राज्य की सार्वभौमिक योजनाओं को पूंजीवादी विकास के रास्ते में बर्दाश्त ही नहीं कर सकती। इसलिए कल्याणकारी राज्य में सार्वभौमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, पेंशन सहित सभी तरह की सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, महिलाओं सहित सभी के लिए सुरक्षित रोजगार आदि मूलभूत सेवाओं को नवउदारवादी सत्ता गैरजरूरी मानती है क्योंकि इससे सरकारी खर्च बढ़ता है जिसका परिणाम राजकोषीय घाटे के तौर पर पेश किया जाता है। इसलिए नागरिकों का कोई अधिकार नहीं होगा।

अगर नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सजग रहेंगे तो वह इनकी सुरक्षा के लिए आंदोलन करेंगे। लेकिन हमें यह रखना चाहिए कि सत्ताधारी वर्ग केवल ताकत से राज नहीं करता बल्कि वह नागरिकों की सोच को भी नियंत्रित करता है।

इन तथाकथित कल्याणकारी योजनाओं का यही मकसद है। एक तो सीधा चुनावी फायदा और दूसरा नागरिकों को आभास करवाना कि यह तो सरकार और सत्ताधारी पार्टी उन पर अहसान कर रही है। महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा नहीं होगी, उनके खिलाफ अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, कार्यबल में उनकी हिस्सेदारी लगातार कम हो रही है, वेतन में गैरबराबरी बढ़ रही है और यह सब सरकार ही कर रही है लेकिन महिलाएं इसके खिलाफ आंदोलित न हो, चुनाव में इन मुद्दों पर उनके खिलाफ़ वोट न दे इसलिए उनके लिए ‘लाडकी बहिन योजना’ ।

बिहार में पांच साल में कोई रोजगार नहीं लेकिन चुनाव से पहले ‘मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना’ । महिलाएं वोट तो देंगी ही, लेकिन कालांतर में उनको विश्वास दिलाया जाएगा कि यह उनका हक़ नहीं है। उनके खाते में आने वाले पैसे तो सरकार दे रही है इसलिए एहसान मानिए। अब सरकार की मर्जी है जब उनकी इच्छा होगी पैसा बंद कर देगी या लाभार्थी कम कर देगी।  यही तो पेच है अगर लाभार्थी होंगे तो सरकार की दया पर और अगर नागरिक होंगे तो संवैधानिक तौर पर सरकारों के लिए बाध्यता।  

लक्षित योजनाएँ बनाम सार्वभौमिक अधिकार

इस चलन का एक और पहलू यह है कि ज्यादातर योजनाएं सार्वभौमिक न होकर लक्षित होती हैं। जाहिर सी बात है कि जब लक्ष्य जनता के सभी हिस्सों के लिए सार्वभौमिक सुविधाएं न देना बल्कि केवल लक्ष्य चुनावी फायदा और अपने वफादार वोटर बनाना हो तो केवल कुछ लक्षित लाभार्थियों से काम चल जाएगा क्योंकि यह नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के आड़े नहीं आता।

धीरे-धीरे लाभार्थियों के लिए पात्रता की शर्तें कड़ी की जाएगी, इसका दायरा सिकुड़ता जाएगा और नागरिक जो लाभार्थी बन गए हैं वह यही समझेंगे कि अब वह पात्र नहीं है। उनको यह समझ ही नहीं आएगा कि कि उनके सारे संवैधानिक अधिकार ख़त्म हो गए। 

हालांकि यहां स्पष्ट करना जरुरी है कि पूंजीवादी समाजों में नागरिकता और नागरिक अधिकारों की अपनी सीमाएं हैं। पूंजीवादी राज्य में नागरिकता सभी लोगों को उनकी आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना समान अधिकार और अवसर देने का वादा करती है। यह समानता का भ्रम पैदा करता है, जबकि असल में आर्थिक असमानताएँ बनी रहती हैं। यह दिखावटी समानता, उत्पादन के पूंजीवादी संबंधों में मौजूद असली असमानता को छिपा देती है।

नागरिकता के अधिकार, खासकर संपत्ति के अधिकार, पूंजीवादी व्यवस्था को सही ठहराने और उसकी रक्षा करने का काम करते हैं। ज़्यादातर उदारवादी संविधानों में शामिल निजी संपत्ति का अधिकार, पूंजीपति वर्ग को पूंजी जमा करने में मदद करता है, और इस जमावड़े को वर्ग-प्रधानता के रूप के बजाय एक स्वाभाविक अधिकार के तौर पर पेश करता है।

पूंजीवादी व्यवस्थाएँ मिलकर नागरिकता की विचारधारा को बढ़ावा देती हैं और लोगों को यह सिखाती हैं कि वे खुद को किसी खास आर्थिक वर्ग के सदस्य के बजाय मुख्य रूप से केवल नागरिक के तौर पर देखें। पूंजीवादी विचारधारा में अपनी भूमिका के बावजूद, नागरिकता के अधिकार लोगों को सशक्त बना सकते हैं। यह मज़दूर वर्ग को संगठित होने और विरोध करने के लिए साधन और जगह भी देती है। नागरिकता से जुड़े अधिकारों और संस्थाओं का इस्तेमाल शोषित वर्ग पूंजीवादी प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए कर सकते हैं।

भाजपा राज में कल्याणकारी राज्य का क्षरण और लाभार्थी राजनीति का विस्तार

यह कोई संयोग नहीं है कि हमारे देश में पिछले एक दशक में जहां एक तरफ कल्याणकारी राज्य का ढांचा लगभग तहस- नहस कर दिया गया है और नागरिक अधिकारों पर हमले लगातार बढ़े हैं वही ज्यादातर राज्यों में डायरेक्ट कैश बेनेफिट वाली योजनाओं का इस्तेमाल बढ़ा है।  यह ठीक वही दौर है जब कुछ अपवादों को छोड़ कर कल्याणकारी राज्य की जनहितैषी सार्वजनिक संस्थाओं पर हमले के विरोध मुश्किल हुए है। 

उदाहरण के लिए पिछले एक दशक में देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य को बहुत कमजोर कर दिया गया है। सरकार ने नागरिको को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करवाने की अपनी ज़िम्मेदारी से हाथ पीछे खींच लिए हैं।  सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली जर्जर हो चुकी है और नागरिको को प्राथमिक सेवाओं के लिए भी प्राइवेट क्षेत्र पर निर्भर होना पड़ रहा है।  इसका भयानक रूप हम कोरोना काल में देख चुके हैं जब आपराधिक तौर पर सरकार ने लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया था। 

लेकिन इस सब के वावजूद भी ऐसी तस्वीर पेश की जा रही है कि देश के प्रधानमंत्री अपनी जेब से लोगो के इलाज के लिए पैसे दे रहे हैं। कम से कम देश का मीडिया तो यही कहानी बता रहा है। और इसका आधार है ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017’ के तहत लागू भारत सरकार की प्रमुख योजना ‘आयुष्मान भारत’। इसके तहत नागरिको को सीधे स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलती बल्कि एक आयुष्मान कार्ड बनता है जिसके जरिये निजी अस्पतालों में चुनिंदा रोगों की प्रति परिवार वार्षिक 5 लाख रुपये का इलाज करवाया जा सकता है।

मायने यह है कि सरकारी अस्पताल के लिए पैसे नहीं लेकिन सरकार निजी अस्पताल में इलाज के लिए सीमित पैसे देगी। जाहिर है यह सबके लिए नहीं है बल्कि आयुष्मान कार्ड बनाने के लिए कठोर शर्तें हैं। वर्तमान में देश में 42 करोड़ आयुष्मान  कार्ड बने हैं। कहाँ तो इस नीति ने सरकारी स्वास्थ्य ढांचे के लिए ज़हर का काम किया लेकिन भाजपा ने इसे अपनी एक उपलब्धि बताते हुए अपनी गरीब-हितैषी तस्वीर बनाई और चुनावों में फायदा भी लिया। 

पूरी प्रक्रिया का परिणाम यह है कि अब नागरिक स्वास्थ्य को अधिकार नहीं मान रहे और उसके लिए लड़ेंगे नहीं बल्कि जब किसी का आयुष्मान कार्ड से इलाज होगा तो कृतज्ञता मोदी जी के प्रति होगी। देश के नागरिकों का अधिकांश हिस्सा इन स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जायेगा लेकिन संघर्ष नहीं करेगा बल्कि यही सोचेगा कि वह इसके लिए योग्य नहीं है। 

ऐसा ही एक उदाहरण जिसने भाजपा को चुनावो में खूब फायदा पहुँचाया है प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना। गरीब परिवारों की वयस्क महिलाओं को बिना डिपॉजिट वाले एलपीजी कनेक्शन देने के लिए मई 2016 में यह योजना शुरू की गई थी जिसके तहत, लाभार्थियों को शुरू में हर साल 14.2 किलोग्राम के 12 सब्सिडी वाले सिलेंडर मिलते थे। हम सब जानते हैं कि इस योजना के बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल प्रचार पर खर्च किया जाता है।

लेकिन इसका देश में गैस सिलेंडर के दाम और उपलब्धता पर गहरा असर पड़ा।  पहले तो घरेलू गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी लगभग खत्म हो चुकी है। इसको ख़त्म करने की प्रक्रिया भी दिलचस्प है। पहले नागरिकों को कहा गया कि उनको गैस सिलेंडर की पूरी कीमत अदा करनी है और सरकार सब्सिडी उनके बैंक खाते में वापस डाल देगी।  दरअसल उनको अहसास करवाया गया कि सब्सिडी के पैसे सरकार की तरफ से दिए जा रहे है, मतलब नागरिकों का हक़ नहीं है और फिर धीरे धीरे सब्सिडी कम कर दी। 

ठीक इसी समय पूरे देश में गैस सिलेंडर की कीमतें लगातार बढ़ती गई। नागरिकों को बताया गया कि सरकार तो जरूरतमंद महिलाओं को उज्ज्वला योजना में सस्ते सिलेंडर दे रही है। फिर इस योजना में मिलने वाले सिलेंडरों की संख्या पहले 12 से घटाकर 9 कर दी गई और अब केवल 4 रह गई है।  लेकिन कोई विरोध नहीं क्योंकि यह तो सरकार की दरियादिली थी और मज़बूरी में सरकार इसे कम कर रही है तो गुस्सा कैसा।  

यह केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित नहीं है। देश में किसानों की हालत किसी से छिपी नहीं है। लगभग सभी फसलों की लागत-कीमत में बेहताशा बढ़ोत्तरी हुई है।  इसका मुख्य कारण सरकार की ओर से किसानों को मिलने वाली सब्सिडी में कमी है।  पहले खाद, बीज, कीटनाशक, बिजली आदि पर सब्सिडी मिलती थी लेकिन अब नवउदारवादी दौर में अंतरराष्ट्रीय समझौतों के चलते देश  की सरकार ने किसानों को बाजार के हवाले छोड़ दिया है। 

अब खाद, कीटनाशक, बिजली सब महंगा हो गया है परिणामस्वरूप सभी फसलों की औसत लागत कीमत भी बढ़ गई है लेकिन बाजार में किसानों के उत्पाद की खरीदारी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भी नहीं होती। प्रतिवर्ष हज़ारों की संख्या में देश के किसान और खेतमजदूर आत्महत्या करने के लिए मज़बूर हो रहे हैं, जाहिर गुस्सा सरकार के खिलाफ भी जा रहा था। आंदोलन भी हो रहे थे।

इसी बीच लोकसभा चुनावों से ठीक पहले फरवरी 2019 में भाजपा सरकार पीएम-किसान योजना शुरू की गई थी जिसके तहत केंद्र सरकार सभी पात्र किसानों को सालाना 2,000 रुपये की तीन किस्तें देती है। यह पैसा केंद्र सरकार की ओर से सीधे किसानों के बैंक खातों में ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ के ज़रिए भेजा जाता है। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले ही 11.84 करोड़ किसानों को 2,000 रुपये की किस्त जारी की गई थी। भाजपा को इसका चुनावी लाभ भी मिला। 

बाद में इसके लिए कठोर शर्ते लागू की गई जिसके चलते वर्तमान में जब 20 जून, 2026 को 23वीं किस्त जारी की गई तो केवल 9.44 करोड़ किसानों इसके लिए पात्र रह गए है। यह एक सटीक उदाहरण है समझने का किस तरह सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटते हुए किसानों के विरोध में बाज़ार-उन्मुख नीतियां लागू कर रही है और खेती भी कॉर्पोरेट के हवाले करने पर उतारू है लेकिन पीएम-किसान योजना के तहत भ्रामक तस्वीर पेश कर रही है।  

माई-बाप सरकारकी वापसी और लोकतांत्रिक जवाबदेही का संकट: अधिकार-आधारित कल्याण और लक्षित ट्रांसफर के बीच का अंतर कई नीतिगत क्षेत्रों में साफ़ दिखाई देता है। सभी के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा इस सिद्धांत पर आधारित हैं कि आय चाहे जो भी हो, हर नागरिक की उन तक समान पहुँच होनी चाहिए। इसके उलट, पीएम-किसान जैसी योजनाएँ सिर्फ़ ज़मीन के मालिक पात्र किसानों को ही हर साल तय नकद राशि देती हैं, और इसमें लाखों खेतिहर मज़दूर और ज़मीन-विहीन ग्रामीण मज़दूर छूट जाते हैं, जो ग्रामीण भारत के सबसे गरीब तबके का हिस्सा होते हैं। 

अगर देखें तो मनरेगा के तहत, राज्य को शुरुआती हिचकिचाहट के बावजूद, अपने नागरिकों के ‘काम के अधिकार’ को मान्यता देने के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे मज़दूर सशक्त हुए और काम व मज़दूरी के लिए जवाबदेही की उनकी माँगों को वैधता मिली। लेकिन अब इस काम के अधिकार को वीबी-ग्रामजी में सरकार की दया पर आश्रित कर दिया है और मज़दूरों को लाभार्थी में बदल दिया है, जिन्हें  लाभ (काम) को पाने के लिए अपनी पात्रता साबित करनी होती है।

इस पूरी प्रक्रिया में नागरिकों के प्रति एक ज़रूरी ज़िम्मेदारी मानने के बजाय, राज्य की कल्याणकारी ज़िम्मेदारियों को ‘माई-बाप सरकार’ की मेहरबानी या दान के तौर पर पेश किया जा रहा।  इससे राज्य अपनी जवाबदेही से बचता है। और नागरिक छोटे-मोटे अफ़सरों और स्थानीय नेताओं की दया पर निर्भर हो रहे हैं। इस चलन का एक और चिंताजनक नतीजा यह है कि कल्याणकारी योजनाओं की प्राथमिकताएं अब निष्पक्ष सामाजिक ज़रूरतों के बजाय चुनावी हिसाब-किताब से तय होने लगी हैं।

स्वाभाविक रूप से, सरकारें उन सामाजिक समूहों पर ज़्यादा ध्यान देती हैं जिनकी चुनावी अहमियत और लामबंदी ज़्यादा होती है। जिन समूहों की वोटिंग ताकत या राजनीतिक प्रभाव ज़्यादा होता है, उन्हें अक्सर उदार योजनाओं का फ़ायदा मिलता है, जबकि कम संगठित या संख्या में कमज़ोर वर्ग नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं। इस तरह, नीतियां सामाजिक न्याय या सबके लिए समान नागरिकता के सिद्धांतों के बजाय चुनावी गणित से तय होने लगती हैं।

वर्गीय संघर्ष  से नगरीय अधिकारों की पुनर्स्थापना: मार्क्सवादी नज़रिए से देखें तो, यह बदलाव नव-उदारवाद के दौर में पूंजीवादी राज्य के बदलते स्वरूप को दिखाता है। पूंजीवाद से पैदा होने वाली ढांचागत असमानताओं, जैसे उत्पादन के साधनों का असमान मालिकाना हक, बेरोज़गारी, नौकरी की असुरक्षा, कम वेतन और शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुँच, को दूर करने के बजाय, राज्य अब सीमित नकद हस्तांतरण के ज़रिए सामाजिक असंतोष को संभालने की कोशिश कर रहा है।

ऐसी नीतियां मौजूदा वर्ग-संबंधों को तो नहीं बदलतीं, लेकिन सिस्टम की वजह से पैदा हुई मुश्किलों के लिए बहुत मामूली मुआवज़ा देती हैं।

गरीबी और असमानता के ढांचागत कारणों को उजागर करके वर्ग-चेतना को मजबूत करने के बजाय, लक्षित नकद हस्तांतरण आर्थिक संकट को व्यक्तिगत मामला बना देते हैं। मजदूर, किसान, बेरोजगार युवा या असंगठित क्षेत्र का मज़दूर अब एक ऐसे सामूहिक वर्ग का हिस्सा नहीं दिखता जो एक जैसा शोषण झेल रहा हो। इसके बजाय, हर व्यक्ति सरकार से मदद पाने वाला एक लाभार्थी बन जाता है। इससे वेतन, रोजगार, भूमि सुधार, श्रम अधिकारों और सभी के लिए सामाजिक सुरक्षा से जुड़े सामूहिक संघर्ष कमजोर पड़ते हैं।

जनता को ‘लाभार्थी’ बनाकर राज्य की जवाबदेही से मुक्त करने की इस राजनीति का मुकाबला तभी किया जा सकता है जब शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन को फिर से संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के रूप में स्थापित करने का व्यापक जनसंघर्ष खड़ा हो। नकद सहायता, यदि आवश्यक हो, तो वह इन अधिकारों का विकल्प नहीं बल्कि उनका पूरक होनी चाहिए।

लोकतंत्र की असली कसौटी सरकार की दया पर मिलने वाले लाभ नहीं, बल्कि जनता द्वारा अपने अधिकारों को संगठित होकर हासिल करने और उनकी रक्षा करने की क्षमता है। इसलिए आज सबसे बड़ी आवश्यकता नागरिकों को फिर से ‘लाभार्थी’ नहीं, बल्कि अधिकार-संपन्न नागरिक और संघर्षशील जनशक्ति के रूप में संगठित करने की है और इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को मेहनतकश वर्ग तथा उसके जनसंगठनों को अपने हाथों में लेना होगा।

(लेखक ऑल इंडिया एग्रीकल्चर वर्कर्स यूनियन के संयुक्त सचिव हैं।) 

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